भारत में फ़ेसबुक के चेहरे पर उठते सवाल

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नरेंद्र मोदी 2015 में अमरीका के दौरे पर थे और फ़ेसबुक के संस्थापक-सीईओ मार्क ज़करबर्ग ने अपने मुख्यालय में उनके लिए एक टाउनहॉल आयोजित किया था.

10 साल पहले की अपनी महीने भर की भारत यात्रा को याद करते हुए ज़करबर्ग ने उसी मंच से कहा, “फ़ेसबुक के इतिहास में भारत का बहुत महत्व है. कंपनी जब बुरे दौर से गुज़र रही थी और बंद होने की कगार पर थी तब मेरे गुरु स्टीव जॉब्ज़ (एपल के संस्थापक) ने मुझे भारत के एक मंदिर जाने की सलाह दी. वहाँ से लौटकर मुझे आत्मबल मिला और कंपनी सफल होती गई”.

सार्वजनिक तौर पर तो ये बात मार्क ज़करबर्ग ने पहली बार कही थी लेकिन इस वाक़ये से साफ़ हो चला था कि भारत उनकी ‘लिस्ट’ में ऊपर है.

इसके ठीक एक साल पहले ज़करबर्ग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान इशारा किया था कि उनका इरादा ग़रीब लोगों तक इंटरनेट पहुँचाने का है. ज़ाहिर है इस प्रक्रिया में फ़ेसबुक भी केंद्र में ही रहता और ये ज़करबर्ग के “फ़्री बेसिक प्रोग्राम’’ के तहत होने वाला था जिसकी बुनियाद internet.org प्लान पर टिकी थी.

लेकिन दुनिया के कई अन्य देशों की तरह फ़ेसबुक की ये योजना भारतीय टेलीकॉम नियामकों को भी खटक गई थी क्योंकि इस योजना से ‘नेट न्यूटरैलिटी’ यानी इंटरनेट के स्वतंत्र रहने पर ही खतरा दिख रहा था.

बहरहाल, इस मामले को पूरे छह साल हो चुके थे और इस बीच फ़ेसबुक ने भारत में लोकप्रियता की एक नई मिसाल बना डाली थी.