जब बुढ़ापे में हो जाए प्यार

0
74

चंद्रकला कौलोनी का प्राइवेट ओल्डएज होम रंगीन पन्नियों, फूलों और रंग-बिरंगे जगमगाते बल्बों के बीच बिल्कुल दुल्हन सरीखा नजर आ रहा था. ओल्डएज होम यानी वृद्धाश्रम, जहां जिन्दगी के आखिरी पड़ाव पर मौत का इंतजार करते, जिन्दगी से बेजार, लाचार, दुखी, अकेले और अपने ही घरों से जबरन बाहर ढकेल दिये गये बुजुर्ग रहते हैं, वहां इस तरह का नजारा आसपास रहने वाले लोगों में कौतूहल पैदा कर रहा था. जो लोग इस वृद्धाश्रम की ओर कभी झांकते तक न थे, आज वे भी उसके बरामदे में इकट्ठा थे. थोड़ी देर में एक पंडितजी भी अपने दो चेलों के साथ आ पहुंचे. वृद्धाश्रम के मालिक रामदयाल मनसुख को पंडितजी के आने की खबर मिली तो वे भागे-भागे द्वार तक आये और बड़े आदर-सत्कार के साथ उन्हें भीतर ले गये. अन्दर छोटे से आंगन में लगन-मंडप सज रहा था. अनुपम दृश्य था. चारों तरफ बुजुर्गों की चहल-पहल थी. बूढ़े चेहरों पर आज अनोखी खुशी छलक रही थी. फूलों और इत्र की महक के साथ-साथ पकवानों की सुगंध उड़ रही थी. हल्का-हल्का म्यूजिक बज रहा था. स्पष्ट था कि आज यहां किसी की शादी है. मगर किसकी? आखिर वृद्धाश्रम में कौन युवा है, जो आज शादी के बंधन में बंधने जा रहा है?

थोड़ी ही देर में मोहल्ले वालों की जिज्ञासा शान्त हुई. कुछ ही देर में रेशमी लाल साड़ी में सजी 75 वर्षीया सुहासिनी काला और सफेद धोती-कुर्ते पर रंगीन सदरी में 79 वर्षीय कांतिदास लगन मंडप में आ बैठे. पंडित जी ने मंत्र पढ़ने शुरू किये, हवनकुंड में आहुतियां पड़ीं, फेरे हुए और कांतिदास ने सुहासिनी काला की मांग में सिंदूर भर कर गले में मंगलसूत्र पहना दिया. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच शुभकामनाओं की झड़ी लग गयी. शादी में शरीक सभी लोगों को वृद्धाश्रम के मालिक ने खाने का निमंत्रण दिया और शर्माते-लजाते दूल्हा-दुल्हन को लेकर खाने की टेबल की ओर चल पड़े.

उस रात वृद्धाश्रम का एक कमरा सुहासिनी काला और कांतिदास का सुहागकक्ष बना और बाद में उन दोनों का सामान भी उसी कमरे में शिफ्ट कर दिया गया. अब वह उन दोनों का कमरा था. आखिर वे पति-पत्नी जो बन गये थे. उम्र के अंतिम पड़ाव पर दोनों के मन में एक बार फिर से जिन्दगी जीने की ललक उठी थी. एक दूसरे के लिए प्रेम उत्पन्न हुआ था. एक दूसरे का साथ अच्छा लगने लगा था. घंटों एक दूसरे के साथ बिताने के बाद भी मन नहीं भरता था. उन्हें एक दूसरे की चिन्ता होती थी. सुबह शाम का खाना दोनों साथ ही खाते थे. बाहर के छोटे से लॉन में साथ बैठ कर धूप सेंकते थे. उनकी गहरी दोस्ती सबको नजर आ रही थी. एक रोज वृद्धाश्रम के मालिक रामदयाल मनसुख ने बातों-बातों में कांतिदास से कह दिया कि सुहासिनी जी के साथ उनकी जोड़ी अच्छी जमती है, क्यों नहीं उन्हें जीवनसाथी बना लेते हैं?

कांतिदास झेंप गये. फिर धीरे से बोले, ‘अब इस उम्र में क्या शादी करूंगा?’ हालांकि उनके मन में तो इस बात से ही चुलबुली होने लगी थी. खुशियों के लड्डू फूटने लगे थे. और यह खुशी उनके चेहरे पर भी छलक आयी थी. रामदयाल उनके दिल की बात समझ रहे थे. अनुभवी आदमी थे और वैसे भी प्यार छिपाये नहीं छिपता, वह समझाते हुए बोले, ‘प्यार के बीच में उम्र कहां से आ गयी? आप दोनों को एक दूसरे का साथ अच्छा लगता है, आप दोनों एक दूसरे को पसन्द करते हैं तो शादी क्यों नहीं कर लेते? आपको शादी से रोकने वाला कौन है? हमें तो बहुत खुशी होगी अगर हमारे वृद्धाश्रम से इस बात की शुरुआत होगी? आखिर अकेले रहने की सजा क्यों भुगतना? अगर मन को कोई अच्छा लगता है तो छाती ठोंक कर उसे अपना बना लीजिए. हम सब आपके साथ हैं. आप सुहासिनी जी से बात करिये. मुझे लगता है वह भी न नहीं कहेंगी.’ और बस बात बन ही गयी. घर, परिवार, बच्चों और नाती-पोतों से दूर कर दिये गये दो अकेले बुजुर्गों को एक-दूसरे का साथ और प्यार मिल गया.

सुहासिनी काला इस आश्रम में पिछले पांच साल से रह रही हैं. उनकी तीन शादीशुदा बेटियां इसी शहर में हैं, मगर मां के लिए उनके घरों में कोई जगह नहीं है. पिता की मौत के बाद तीनों ने मिलबैठ कर गुपचुप उनकी प्रॉपर्टी एक बिल्डर के हाथों बेच दी और सारे पैसे आपस में बांट लिये. मां को कुछ दिन के लिए कभी एक बहन तो कभी दूसरी बहन अपने पास रखने लगी, मगर जल्दी ही यह सिलसिला भी खत्म हो गया. तीनों ने मां के लिए यह वृद्धाश्रम खोज निकाला और एक सूटकेस के साथ उन्हें यहां पटक गयीं. पहले एकाध साल तक तो हफ्ते-दो हफ्ते में कोई न कोई आकर उन्हें देख जाता था, मगर धीरे-धीरे सबका आना बंद हो गया. कांतिदास का भी यही हाल था. उन्होंने अपने जीवनभर की कमाई अपने दोनों बेटों को पालने और उन्हें अच्छी नौकरी में सेट करने में लगा दी. बाद में दोनों विदेश जाकर सेटल हो गये. अब विधुर पिता को कोई पूछता भी नहीं है. कांतिदास बिल्कुल अकेले पड़ गये थे. सारा दिन अकेले घर में भूत की तरह बैठे पुराने दिनों को याद करके रोया करते थे. तब किसी ने उनको इस वृद्धाश्रम का पता बताया. उनकी उम्र के यहां काफी लोग थे, लिहाजा कांतिदास अपना छोटा सा घर बेचकर यहां आ गये ताकि मरने के बाद कोई दाहसंस्कार करने वाला तो हो. मगर अब सुहासिनी काला से शादी के बाद कांतिदास में जीने की नई इच्छा जाग उठी है.

ऐसे कितने ही बुजुर्ग हैं जो घर-परिवार, बच्चों-रिश्तेदारों के होते हुए भी नितान्त अकेले हैं. ऐसा नहीं है कि घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद भावनाएं, प्रेम और इच्छाएं भी इन्सान को मुक्त कर देती हैं. हरगिज नहीं, बल्कि बुढ़ापे में तो प्यार और स्नेह की जरूरत पहले के मुकाबले और ज्यादा महसूस होती है. हर बूढ़े व्यक्ति की ख्वाहिश होती है कि कोई न कोई उसके पास हो, जिससे वे जीवन भर के अनुभवों को साझा कर सकें. जब करने को कुछ न हो तो फिर बातें ही होती हैं, जिन्हें सुनने वाला भी कोई चाहिए. ऐसे में जब पति या पत्नी में से कोई एक पहले चला जाए तो अकेला जीवन बड़ा कठिन हो जाता है.

अक्सर मौर्निंग वाक पर निकलने वाले बुजुर्गों को आपने देखा होगा कि वे अपनी उम्र के लोगों से जल्दी ही दोस्ती कर लेते हैं. पार्क इत्यादि में अपने पसन्द के साथी के साथ गुफ्तगू करने में उन्हें खूब आनन्द आता है. हालांकि समाज और परिवार क्या कहेगा, इस डर से स्त्री-पुरुष अकेले बैठ कर बातचीत करते कम ही नजर आते हैं, लेकिन ग्रुप में वह खूब हंसी-ठिठोली करते हैं. आज अगर सामाजिक मान्यताओं-बंदिशों और बदनामी का डर न हो तो उम्र के अन्तिम पड़ाव पर पहुंच चुके लोगों में भी जीवन के प्रति वही रंग और रोमांच दिखने लगे, जो जवानों में होता है.

जरूरत है एक साथी की

जीवनसाथी की जरूरत सिर्फ यौन आवश्यकताएं पूरी करने या बच्चे पैदा करने के लिए नहीं होती, बल्कि इससे अलावा भी कई मानसिक और भावनात्मक जरूरतें हैं, जिसके लिए कोई करीबी साथी चाहिए. एक बुजुर्ग व्यक्ति की जरूरतों और उसकी भावनाओं को उसका हमउम्र व्यक्ति जितनी सरलता से समझ सकता है, वह जवान या बच्चे नहीं समझ सकते हैं. बूढ़ों के पास बहुत सारी बातें होती हैं, पुरानी यादें होती हैं, अनुभव और उदाहरण होते हैं, जो वे बांचना चाहते हैं, लेकिन युवाओं या बच्चों के पास उन्हें सुनने का वक्त कहां होता है? ऐसे में इन बुजुर्गों को जरूरत होती है एक ऐसे साथी की, जो हर वक्त उनके पास रहे. अपनी-अपनी लाइफ में बिजी युवाओं को अपने अकेले रह गये माता या पिता की इस इच्छा की ओर देखने और समझने की जरूरत है और अगर उन्हें कोई हमउम्र साथी पसन्द है तो सामाजिक बंधनों और मान्यताओं को ताक पर रख कर अपने बुजुर्गों की खुशी को पूरा करने की पहल करनी चाहिए, ताकि जीवन के प्रति उनका उत्साह भी अंतिम सांस तक बना रहे.

वृद्ध मेट्रीमोनी सर्विस की शुरुआत

यह एक ऐसा काम है जिसकी शुरुआत विदेशों में हो चुकी है, वहां वृद्धावस्था कोई बोझ नहीं है, लोग बुढ़ापे में भी खूब शादियां कर रहे हैं, मगर भारतीय समाज अभी तक कुंठाओं और मान्यताओं में दबा कराह रहा है. हाय, इस उम्र में शादी करेंगे तो लोग क्या कहेंगे… ऐसी मानसिकता से लोग बाहर ही नहीं निकल पा रहे हैं. इस दिशा में चेतना फैलाए जाने और वृद्ध मेट्रीमोनी सर्विस शुरू करने की जरूरत है. इसके अलावा वृद्धाश्रमों में रह रहे बूढ़ स्त्री-पुरुषों को भी आपस में शादी करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि झिझक त्याग कर वे खुले दिल से अपनी जिन्दगी में उसका स्वागत कर सकें जिससे वे प्यार करने लगे हैं.

बच्चों को भी मिलेगी राहत

आजकल महानगरों में ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों में भी ज्यादातर युवा रोजगार के कारण दूसरे शहरों या विदेशों में रहते हैं. दिल्ली जैसे शहर में हर दूसरे-चौथे घर में कोई न कोई बुजुर्ग मिल जाएगा, जो अकेला जीवन व्यतीत कर रहा है. ऐसे में उनसे दूर रह रहे बच्चे यह सोच कर परेशान होते रहते हैं कि – पता नहीं आज मेड आयी या नहीं, उनको खाना मिला या नहीं, वे बीमार तो नहीं है आदि आदि. वे फोन पर उनका हालचाल लेते हैं और इनमें से कोई भी बात पता चलने पर व्याकुल हो जाते हैं. ऐसी स्थिति से बचने के लिए यदि वे अपने अकेले रह गये माता या पिता के लिए एक अच्छा रिश्ता ढूंढ दें और उनका घर फिर से बसा दें, तो उनकी रोजमर्रा की चिन्ता से मुक्त हो सकेंगे. मृत्यु तो एक दिन सबको आनी है मगर उसका इंतजार करने में जिन्दगी जाया करने बेहतर है कि जिन्दगी को किसी मनपसंद साथी के साथ खुशी-खुशी जिया जाए.